90 के दशक के मिलोडी किंग कहे जाने वाले कुमार सानु की कहानी जिन्हें हम प्यार से सानु दा कहते है,1980 के दशक अखरी सालो की बात है। कलकत्ता से एक लड़का मुंबई पंहुचा इनकी ख्वाहिश थी की फिल्मो में गना गाना धीरे धीरे से वासी इलाके में कुछ लोगो से जन पहचान हो गई।

इसी इलाके की एक मेस में उसको आपने साथ रहने और खाने का इंतजाम कर दिया। शर्त बस यह थी की दिन में केवल दो चार गाना सुनाना होगा बात तो बन गयी लेकिन मुंबई जैसे मँहगे शहर में इस लड़के के रहने और खाने का इंतजाम हो गया।

एक दिन इस इलके थोड़े ही दुर के होटल में देखा की एक गायक गाना गा रहा है। उसे लगा की वो भी लोगो के मनोरंजन के लिए ये काम कर सकता है। और होटल के मलिक से मिलने का समय माँगा और बड़ी मुश्किल से मुलाकात हुई। इस लड़के ने आपने बारे में बताते हुए कहा की इस इस तरह तो मै भी गा सकता हु।

और होटल के मलिक ने जवाब दिया ठीक है तुम भी गा सकते हो,लेकिन जो गायक मेरे यहाँ पहले से है मै उनका क्या करू काफी बातचीत के बाद तय हुआ की उस लड़के को एक गाना गाने का मोका मिलेगा। उस लड़के ने इस होटल में भाई लोगो के लिए जो गाना गया था वो गाना है “मेरे नाइना शावन भादो फिर भी मेरा मन प्यासा”

1976 में फिल्म महबूबा में किशोर कुमार के गए इस गाने को लड़के ने गया तो होटल में आये सभी लोग दंग रह गए। और टिप देने का सिलशिला शुरु हो गया। उस समय जब रुपया की कीमत आज से बहुत ज्यदा होती थी तब उस लड़के के पास 5000 रूपया के करीब टिप जमा हो गए। उसके बाद होटल के मलिक उस लड़के से सिर्फ़ इतना कहा की आप तो गाना गाते ही रहो और कल से तुम्हरी नोकरी पक्की हो गयी है।
आप तो जन ही गए होंगे की ये लड़का कोन था यर कहानी है केदारनाथ भट्टाचार्य यानी कुमार सानु की एक ऐसा गायक 90 के दशक में फिल्म इंडस्ट्री में गाने के छेत्र में राज किया। सानु दा की फिल्म में बहुत ही दिलचस्प है, इनका जन्म हुआ था 20 अक्टूबर 1957 कोलकाता में इनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहा दिन रात संगीत का माहोल था। सानु जब छोटे थे तब इन्होने मोत को मत देकर नई जिंदगी पाई थी।

जिसमे की उनके एक पड़ोश की महिला का बड़ा रोल था आइये बताते है वो दिलचस्प किस्सा जब पड़ोश की एक महिला ने उसकी जन बचाई थी। हुआ ये था की जब कुमार सानु एक साल थोड़े ही बड़े थे तो घुटनों के बल चलते चलते घर के बहर एक तलब तक पहुच गए थे। थोड़ी ही देर में वो तलाब के भीतर जा चुके थे।

एक माहिला वाही पास में बर्तन धो रही थी उन्हें जब एक छोटा सा बच्चा को कीचड़ में घिसता हुआ दिखाय दिया। तो उन्होंने किसी तरह उस बच्चे को बहार निकाला,कीचड़ से सने बच्चे को गोद में उठाकर उन्होंने मोहल्ले में घुमा घुमाकर पूछना शुरु किया की ये किसका बच्चा है तब जाकर किसी तरह कुमार सानु आपने घर पहुचे।

कुमार सानु के पिता पशुपतिनाथ भट्टाचार्य शास्त्रीय संगीत के गायक थे बच्चो को पढ़ाते भी थे और पांच भाई बहन में से हर किसी को संगीत पसंद था। परेशानी ये थी की आच्छे गायक होने के बाद भी पशुपतिनाथ जी के पास हमेशा पैसे की किल्लत रहती थी। जब ये छोटे थे तब उन्हें लगता था शास्त्रीय संगीत में जाकर भी रुपये पैसे की कमी ही रहेगी।

इन्होने ये तय कर लिया था की फिल्मो के लिए गाना गायेंगे इतना तय करने से कम चलने वाला नहीं था। क्योंकि पिताजी बहुत शाक्त मिजाज के थे किसी तरह कुमार सानु सभी को समझा बुझाकर बंबई पहुच गए। कुमार सानु एक बहुत ही आच्छे तबला वादक भी है कोलकत्ता में आपने बड़े भाई के साथ तबला बजाया करते थे।

कुमार सानु को सबसे पहले ब्रेक मिला एक फिल्म “तीन कन्या” लेकिन बॉलीवुड में गाने का सपना कोसो मील दुर था। कुमार सानु होटल्स में ही गाकर आपना दिन काटने लगे और सन 1989 में बॉलीवुड में पहला ब्रेक मिला फिल्म “हीरो हीरालाल” में उसके बाद कुमार सानु के करियर में भगवन बनकर आये मशहूर गजल गायक “जगजीत सिंह” को बहुत ही कम लोग जानते है जगजीत सिंह ने ही कुमार सानु को शुरुवाती फिल्मो में गाना गाने का ऑफर दिलाने में काफी ज्यदा मदद की थी।

हुआ यू था की कुमार सानु एक बार किसी स्टूडियो में किशोर कुमार के गाने गा रहे थे। तब जगजीत सिंह भी वहा पर मोजूद थे,कहते है की जगजीत सिंह को कुमार सानु की गायिकी और गायिकी का अंदाजा बहुत ही पसंद आया। उन्होंने कुमार सानु के बारे में पता किया और आगले दिन आपने घर आने का न्योता भी दिया।

सानु दा के लिए तो ये सपनो को पूरा होने जैसे बात थी। जगजीत सिंह मुलाकात के बाद इनकी कहानी और आगे बढ़ी,जब उन्होंने कुमार सानु को कल्याण जी आनंद जी से मिलवाया तो कुमार सानु इस गायिकी से वे भी उत्सुक हो गए।

जो की कुमार सानु के गायिकी में किशोर दा की झलक मिलती है इन्होने ही केदारनाथ भट्टाचार्य को कुमार नाम दे दिया घर पर इनको प्यार से लोग सानु कहकर बुलाते थे। इस तरह से इनका नाम पड  गया कुमार सानु,सानु दा के लिए बम्बई में उनका ये नया नाम जन्म हुआ था।
कल्याण जी आनंद जी ने उन्हें आपने फिल्म “जादूगर” में गाने का मोका दे दिया और एक दिलचस्प किस्सा बताते है जब किशोर कुमार के बेटे अमित कुमार के जगह कुमार सानु को गाने का मोका दिया गया,1990 में एक फिल्म बन रही थी “अंधिया” फिल्म की संगीत बप्पी लहरी दे रहे थे।

शत्रुधन सिन्हा के आवाज पर एक प्ले बेक सिंगर की तलाश थी इसमें ये तय हुआ की ये गाना अमित कुमार से गाना गवाया जायेगा और गाने की रिकॉर्डिंग तय हुयी। काफी देर के बाद इंतजार करने के बाद भी स्टूडियो नहीं पहुचे तो इसी वक्त कुमार सानु और जगजीत सिंह भी उसी स्टूडियो में मोजूद थे।

जगजीत सिंह के कहने पर वो गाना सानु से गवाया गया ये तय हुआ था की आगर ये गाना पसंद नहीं आया तो बाद में उसे अमित कुमार के आवाज में रिकॉर्ड कर लिया जायेगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ये गाना सानु दा की आवाज में ही रखा गया और इसके बाद तो कुछ ही सालो में कुमार सानु प्लेबेक सिंगिंग में संगीतकारों का पसंदीदा नाम हो गया।

और किशोरे कुमार के मृत्यु हो जाने के बाद लोग कुमार सानु की आवाज में किशोर दा की झलक में दिखने लग गए। कुमार सानु हो या आर डी बर्मन,बप्पी लहरी,कल्याण जी आनंद जी,रजनीकांत प्यारे लाल,हृदयनाथ मंगेशकर और राजेश रोशन से लेकार नादिम शरावंत,आदिम श्रीवास्तव,आनंद मिलन,जतिन ललित,आनु मल्लिक और हिमेश रेशेमिया जैसे संगीकारो से मिलकर काम किया।

90 के दशक में कुमार सानु के जीवन में मोड़ तब आया जब इन्हें फिल्म “आशिकी” मिली आशिकी के गानो ने उस दोर के गायकों की लिस्ट में नम्बर एक पर लाकर खड़ा कर दिया। और फिल्म आशिकी के लिए इन्होने पहला फिल्म फेयर आवार्ड भी जीता,इसके बाद ये शिलशिला कई सालो तक चलता रहा।
1992 में सजन,1993 में दीवाना,1994 में बजीगर और 1995 में एकले हम एकले तुम,1994 ए लव स्टोरी ने उन्हें लगातार सर्वश्रेस्ट प्लेबेक सिंगर का फिल्म फेयर आवार्ड दे समानित किया गया। और 1996 में उदित नारायण ने अखीकर फिल्म “दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे” के गाने के लिए फिल्म फेयर आवार्ड भी जीता था। वो गान था “मेहँदी लगा कर रखना डोली सजा के रखना” हलाकि इसी फिल्म में “तुझे देखा तो ये जाना सनाम” लोगो के जुवान पर छाया था।

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और उन्होंने पद्मश्री से भी नवाजा गया इसी बीच कुछ आगले साल अभिजित,उदित नारायण,हरी नारायण और सानु निगम जैसे गायकों ने भी शानदार गाना गए। बात करे निजी जिंदगी की तो सानु जी काफी उतर चढाव रहा,कुमार सानु ने दो शादिया की थी इसके आलावा बॉलीवुड के दो चर्चित अभिनेत्रीयो से भी इनका नाम जुड़ा है। एक समय ऐसा आया था जब सानु का बॉलीवुड से दुर हो गए गए थे लेकिन फिर साजिद वाजिद उन्हें वापस ले कर आये।

फिल्मो में गायिकी के आलावा कुमार सानु दो बार भारतीय जनता पार्टी से भी जुड़े लेकिन पहली बार उनक सफ़र ज्यदा लम्बा नहीं रहा था और 2014 में उन्हीने अमित शाह के कहने पर दुबारा बी.जे.पि ज्वाइन किया था। उम्मीद करता हु की दोस्तों ये स्टोरी कुमार सानु की पसंद आई होगी तो जरुर आप आपने दोस्तों शेयर करे। 

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